व्यापार विकास

हाल के दशकों में, अक्षय ऊर्जा जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों का सामना करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय एजेंडे का प्रमुख केंद्र बिंदु बन रही है।

वर्ष 2015 में पेरिस में आयोजित कॉप-21 में, भारत ने 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत की हिस्सेदारी को 40% तक बढ़ाने का वादा किया है। जबकि वर्तमान विकास (अगस्त-2021 में प्राप्त 100 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा लक्ष्य) को देखते हुए कॉप-26 (ग्लासगो-2021)  में 2030 तक गैर जीवाश्म ईंधन को 50% तक बढ़ा दिया गया है। उपर्युक्त लक्ष्यों के मुकाबले हमारे देश के महत्वाकांक्षी अक्षय ऊर्जा लक्ष्यों को भी कॉप -26 में कॉप -21 के 450 गीगावॉट की तुलना में 500 गीगावॉट में संशोधित किया गया है।

भारत ने भी कॉप-26 में 2070 तक शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन हासिल करने की घोषणा की है।

उपरोक्त लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन समय की मांग है। उक्त कारण के लिए ऊर्जा का पारगमन एक प्रमुख भूमिका निभाएगा। सौर, पवन, भूतापीय, अपशिष्ट से उत्‍पन्‍न ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन आदि जैसे गैर-पारंपरिक ऊर्जा संसाधनों के विकास और कार्यान्वयन से स्वच्छ और हरित विश्व की दिशा में प्रारंभिक कदम उठाने में बहुत मदद मिलेगी।

उपरोक्त लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए टीएचडीसीआईएल भी सक्रिय रूप से भाग ले रहा है। टीएचडीसीआईएल विभिन्न अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं में मुख्य रूप से सौर और पवन ऊर्जा में भाग लेकर और विकसित करके अक्षय ऊर्जा क्षेत्र के विकास में तेजी ला रहा है। टीएचडीसीआईएल ने ग्रिड स्थिरता और चौबीसों घंटे विद्युत की उपलब्‍धता सुनिश्चित करने के लिए अक्षय ऊर्जा संसाधन तकनीकों जैसे विद्युत, ऊर्जा मिश्रण आदि की प्राकृतिक सीमा को जानने पर भी गंभीर रूप से ध्यान केंद्रित किया है।

हरित हाइड्रोजन ऊर्जा का एक संभावित और स्वच्छ स्रोत बनता जा रहा है और इस प्रकार भविष्य के ईंधन के रूप में उभर रहा है। "राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन" के अनुरूप, टीएचडीसीआईएल हरित हाइड्रोजन परियोजना के कार्यान्वयन में सक्रिय रूप से शामिल है।

जल विद्युत क्षेत्र में क्षमता वृद्धि के लिए, टीएचडीसीआईएल द्वारा पंप स्‍टोरेज संयंत्रों के साथ-साथ नई जल विद्युत परियोजनाओं की खोज की जा रही है एवं इन्‍हें कार्यान्वित किया जा रहा है।